ARTICLES HINDI

इन दिनों भाजपा और उसके संगी-साथियों द्वारा अनवरत प्रचार किया जा रहा है कि कांग्रेस हिन्दू-विरोधी पार्टी है। हर संभव मौके पर यह कहा जा रहा है कि कांग्रेस, हिन्दुओं को अपमानित करती आई है। मक्का मस्जिद मामले में अदालत द्वारा सभी आरोपियों को बरी कर देने के बाद, भाजपा प्रवक्ताओं ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि राहुल गांधी और कांग्रेस ने हिन्दू धर्म को बदनाम किया और उन्हें इसके लिए क्षमायाचना करनी चाहिए। इसी साल कर्नाटक में होने वाले चुनाव के सिलसिले में भाजपा ने राज्य में कांग्रेस की कथित ‘हिन्दू-विरोधी‘ नीतियों का भंडाफोड़ करने के लिए यात्रा निकालने की घोषणा की है। यह प्रचार इस हद तक बढ़ गया है कि पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को हाल में कहना पड़ा कि कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी की तरह देखा जा रहा है।

किसी विशिष्ट धार्मिक समुदाय के संदर्भ में किसी पार्टी की नीतियों को हम किस तरह देखें? भाजपा यह प्रचार करती आई है कि वह हिन्दुओं के हितों की रक्षक है। क्या यह सही है? पार्टी ने राममंदिर,पवित्र गाय, धारा 370, लव जिहाद आदि जैसे मुद्दे उठाए। क्या एक आम हिन्दू को इससे कोई लाभ हुआ? क्या इससे हिन्दू किसानों और श्रमिकों व दलितों की हालत सुधरी? क्या इससे हिन्दू महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में कमी आई? यह दावा कि इस तरह के भावनात्मक मुद्दों को उठाने से हिन्दुओं को लाभ होगा, पूरी तरह से खोखला है। उल्टे, इन मुद्दों ने समाज के साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया,  समाज में नफरत का जहर घोला और हिंसा भड़काई। इस ध्रुवीकरण और हिंसा से मुसलमानों के साथ-साथ हिन्दुओं का भी नुकसान हुआ।

कांग्रेस के हिन्दू-विरोधी होने के दावे में कितनी सच्चाई है? आईए, हम मक्का मस्जिद बम धमाकों का उदाहरण लें।

इसी घटना से जुड़े मालेगांव बम धमाकों की शुरूआती जांच, आईपीएस अधिकारी हेमंत करकरे ने की थी, जो मुंबई पर 26/11 को हुए हमले में मारे गए। स्वामी असीमानंद, जो कि इस मामले में प्रमुख आरोपी थे, ने मजिस्ट्रेट के सामने इकबालिया बयान दिया था। यह बयान किसी दबाव में नहीं दिया गया था और कानून की निगाहों में पूरी तरह से वैध था। जांच में भी यह सामने आया था कि असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित आदि इन धमाकों के पीछे थे। भाजपा सरकार के पिछले चार वर्षों के कार्यकाल के दौरान, संबंधित एजेंसियों ने इस प्रकरण की पैरवी कुछ इस ढंग से की कि ये सब दोषमुक्त घोषित कर दिए गए और महाराष्ट्र एटीएस पर गलत जांच करने का आरोप जड़ दिया गया। जिस समय करकरे मालेगांव विस्फोटों की जांच कर रहे थे, उस समय वे इतने दबाव में थे कि उन्होंने अपने पूर्व वरिष्ठ अधिकारी जूलियो रिबेरो से यह सलाह मांगी थी कि वे इस दबाव का सामना कैसे करें। रिबेरो ने उन्हें यह सलाह दी थी कि वे दबाव को नजरअंदाज करते हुए ईमानदारी से अपना काम करते रहें।

जहां कांग्रेस की हिन्दू-विरोधी छवि बनाने के लिए इस तरह के मुद्दों का इस्तेमाल किया गया, वहीं उसकी मुस्लिम-समर्थक छवि, पिछले कुछ दशकों में निर्मित हुई, विशेषकर, कांग्रेस सरकार द्वारा शाहबानो प्रकरण में उच्चतम न्यायालय केा निर्णय को पलटने से। यह निश्चित रूप से एक गलत कदम था। परंतु इस मामले में भी कांग्रेस ने केवल मुसलमानों के दकियानूसी और कट्टर तबके के आगे समर्पण किया था। इससे आम मुसलमानों को कोई लाभ नहीं हुआ। डॉ मनमोहन सिंह के इस वक्तव्य कि ‘‘मुसलमानों का राष्ट्रीय संसाधनों पर पहला दावा है‘‘ को भी बार-बार दुहराकर यह कहा जाता है कि कांग्रेस, मुसलमानों की पिट्ठू है। जो नहीं बताया जाता, वह यह है कि यह वक्तव्य सच्चर समिति की रपट के संदर्भ में दिया गया था। सच्चर समिति ने इस धारणा को चूर-चूर कर दिया था कि मुसलमानों का तुष्टिकरण किया जा रहा है। समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि स्वाधीनता के बाद से मुसलमानों की आर्थिक स्थिति में भारी गिरावट आई है और साम्प्रदायिक हिंसा से सबसे ज्यादा नुकसान उन्हें ही हुआ है।  एकमात्र स्थान जहां मुसलमानों को आबादी में उनके प्रतिषत से ज्यादा प्रतिनिधित्व प्राप्त है, वह है जेल।

हमारे देश ने अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति के कारण बहुत कुछ भुगता। इस देश को धर्मनिरपेक्षता की राह पर आगे ले जाना कभी आसान नहीं रहा है। भारत मे जनजागरण के साथ भारतीय राष्ट्रवाद का उदय हुआ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जन्मी, जो सभी धर्मों के भारतीयों की प्रतिनिधि थी। कांग्रेस के सन् 1887 के अधिवेशन की अध्यक्षता बदरुद्दीन तैय्यबजी ने की थी। कांग्रेस के अध्यक्षों में पारसी, ईसाई और हिन्दू शामिल थे। उस समय मुस्लिम साम्प्रदायिक तत्व (जैसे सर सैय्यद अहमद खान) कांग्रेस पर हिन्दू पार्टी होने का आरोप लगाते थे। दूसरी ओर, हिन्दू साम्प्रदायिक नेता (जैसे लाला लालचंद) कहते थे कि कांग्रेस, हिन्दुओं के हितों की कीमत पर मुसलमानों का तुष्टिकरण कर रही है। कांग्रेस को हमेशा हिन्दू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के साम्प्रदायिक तत्वों के हमले का शिकार होना पड़ा क्योंकि वह भारतीय राष्ट्रवाद की हामी थी। कुछ कमियों के साथ, मोटे तौर पर उसने धर्मनिरपेक्षता की नीति का पालन किया।

मुस्लिम सम्प्रदायवादियों, जिनमें मुस्लिम लीग शामिल थी, के कांग्रेस पर हमलों का अंतिम नतीजा था पाकिस्तान का निर्माण। हिन्दू सम्प्रदायवादी संगठन जैसे हिन्दू महासभा और आरएसएस यह दावा कर रहे थे कि गांधीजी द्वारा मुसलमानों के तुष्टिकरण के कारण ही मुसलमान अपना सिर उठा सके और पाकिस्तान का गठन हुआ। इसी सोच के नतीजे में नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की हत्या की। नाथूराम गोड़से एक प्रशिक्षित आरएसएस प्रचारक था और सन् 1936 में हिन्दू महासभा की पुणे शाखा का सचिव नियुक्त किया गया था। अदालत में अपने बयान (‘मे इट प्लीज योर आनर‘) में उसने कहा था कि गांधी, पाकिस्तान के निर्माण के लिए जिम्मेदार थे, उन्होंने हिन्दुओं के हितों के साथ समझौता किया और मुसलमानों को सिर पर चढ़ाया।

आज कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी बताकर उस पर जो हमले किए जा रहे हैं, वे उसी सिलसिले का हिस्सा हैं, जो हिन्दू सम्प्रदायवादियों ने शुरू किया था। हिन्दू महासभा-आरएसएस-गोड़से की सोच, पिछले कुछ दशकों में और मजबूत हुई है। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि स्वाधीनता के बाद से मुसलमानों की आर्थिक-शैक्षणिक और सामाजिक स्थिति में गिरावट आई है और पिछले चार दशकों में इस गिरावट की गति और तेज हुई है। सत्ताधारी दल केवल भावनात्मक मुद्दे उठा रहा है जिनसे अन्य समुदायों के साथ-साथ हिन्दुओं का भी नुकसान हो रहा है।

भारत में धर्मनिरपेक्षता की राह पर चलना अधिकाधिक कठिन होता जा रहा है। गांधी को अपने धर्मनिरपेक्ष होने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। उनके समर्पित शिष्य पंडित नेहरू को धर्मनिरपेक्षता की राह पर चलने के कारण आज बदनाम किया जा रहा है। मुस्लिम सम्प्रदायवादियों ने पाकिस्तान के निर्माण का जश्न मनाया था परंतु आज उस देश में न विकास है और ना ही शान्ति। नेहरू, कांग्रेस और गांधी के नेतृत्व में भारत कुछ हद तक देश में बंधुत्व की स्थापना करने में सफल रहा और प्रगति की राह पर आगे बढ़ा। कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी और हिन्दू विरोधी बताने वाले लोग, वे साम्प्रदायिक तत्व हैं जिन्हें ऐसा करने में अपना लाभ दिखता है। अपनी सारी सीमाओं और कमियों के बावजूद, कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की रक्षा करने का प्रयास करती आई है।

Read more…

गत 14 अप्रैल को पूरे देश में लगभग सभी राजनैतिक दलों और समूहों ने डॉ भीमराव अंबेडकर की 127वीं जयंती जोरशोर से मनाई। परन्तु इस मौके पर भाजपा का उत्साह तो देखते ही बनता था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंबेडकर को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि कांग्रेस, अंबेडकर की विरोधी थी और उसने उन्हें कभी वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान सरकार ने जितना सम्मान अंबेडकर को दिया है, वैसा किसी और सरकार ने नहीं किया।

जहाँ तक अंबेडकर पर कब्जा करने के अभियान का सम्बन्ध है, भाजपा, कई स्तरों पर काम कर रही है। पहला, वह यह प्रचार कर रही है कि कांग्रेस, अंबेडकर के विरुद्ध थी और दूसरा, कि भाजपा उनके नाम पर भीम जैसे एप जारी कर और पार्टी  के नेता दलितों के साथ उनके घरों में भोजन कर उन्हें सम्मान दे रहे हैं। इन दिनों अंबेडकर को सम्मान देने की होड़ मची हुई है और इस मामले में भाजपा ने सभी को पीछे छोड़ दिया है। परन्तु क्या भाजपा की नीतियाँ सचमुच उन सिद्धांतों के अनुरूप हैं, जो अंबेडकर को प्रिय थे? सम्मान का क्या अर्थ है? क्या किसी महान व्यक्ति की प्रशंसा में गीत गाना उसका सम्मान है या उसके सामाजिक व राजनैतिक योगदान को मान्यता देना?

यह कहने में किसी को कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि जहाँ तक विश्वदृष्टि और विचारधारा का प्रश्न है, भाजपा और अंबेडकर में कोई समानता नहीं है। भाजपा दो जुबानों में बोलने में माहिर है। पार्टी के इस दावे में कोई दम नहीं है कि कांग्रेस ने अंबेडकर को सम्मान नहीं दिया। हम सब जानते हैं कि जाति प्रथा की बेड़ियों को काटने के अंबेडकर के संघर्ष से प्रभावित होकर ही महात्मा गांधी ने अपना अछूत प्रथा विरोधी अभियान चलाया था। यह अंबेडकर को सम्मान देने का सही और असली तरीका था। यद्यपि, अंबेडकर कांग्रेस के सदस्य नहीं थे, परंतु फिर भी, उन्हें नेहरू केबिनेट में शामिल किया गया और कानून जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपा गया। कांग्रेस ने अंबेडकर के सरोकारों को गंभीरता से लिया और उन्हें संविधानसभा की मसविदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। नेहरू और कांग्रेस, दोनों सामाजिक सुधार के हामी थे और नेहरू के कहने पर ही अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल तैयार किया था, जिसका भाजपा के पितृसंगठन आरएसएस ने जबरदस्त विरोध किया था।

भाजपा का अंबेडकर के प्रति दृष्टिकोण क्या था? सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि भाजपा, 1980 में अस्तित्व में आई। उसके पहले उसका पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ (1952) और उसका पितृसंगठन आरएसएस (1925), राजनीति में सक्रिय था। इन तीनों ही संगठनो की मूल विचारधारा हिन्दू राष्ट्रवाद की थी। सभी नाजुक मोड़ों पर आरएसएस ने विचारधारा के स्तर पर अंबेडकर का विरोध किया। जब भारतीय संविधान का मसविदा संविधानसभा के समक्ष प्रस्तुत किया गया, उस समय आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ (30 नवंबर 1949) ने लिखा, ‘‘भारत के नए संविधान में सबसे बुरी बात यह है कि उसमें कुछ भी भारतीय नहीं है…उसमें भारत की प्राचीन संवैधानिक विधि का एक निशान तक नहीं है। ना ही उसमें प्राचीन भारतीय संस्थाओं, शब्दावली या भाषा के लिए कोई जगह है…उसमें प्राचीन भारत में हुए अनूठे संवैधानिक विकास की तनिक भी चर्चा नहीं है। मनु के नियम, स्पार्टा के लाईकरगस और फारस के सोलन के बहुत पहले लिखे गए थे। आज भी मनु के नियम, जिन्हें मनुस्मृति में प्रतिपादित किया गया है, पूरी दुनिया में प्रशंसा के पात्र हैं और भारत के हिन्दू, स्वतःस्फूर्त ढंग से उनका पालन करते हैं और उनके अनुरूप आचरण करते हैं। परंतु हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए इस सबका कोई अर्थ ही नहीं है‘।

इसी तरह जब अंबेडकर ने संसद में हिन्दू कोड बिल प्रस्तुत किया, उसके बाद इन संगठनों ने उन पर अत्यंत कटु हमला बोल दिया। आरएसएस मुखिया एमएस गोलवलकर ने इस बिल की कड़ी आलोचना की। अगस्त 1949 में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा कि अंबेडकर जिन सुधारों की बात कर रहे हैं ‘‘उनमें कुछ भी भारतीय नहीं है। भारत में विवाह और तलाक आदि से जुड़े मसले, अमरीकी या ब्रिटिश माडल के आधार पर नहीं सुलझाए जा सकते। हिन्दू संस्कृति और विधि के अनुसार, विवाह एक संस्कार है, जिसे मृत्यु भी नहीं बदल सकती। विवाह एक समझौता नहीं है, जिसे किसी भी समय तोड़ा जा सकता है‘‘। उन्होंने आगे कहा, ‘‘यह सही है कि देश के कुछ हिस्सों में हिन्दू समाज की नीची जातियों में तलाक का रिवाज है परंतु इस आचरण को ऐसा आदर्श नहीं माना जा सकता, जिसका पालन सभी को करना चाहिए‘‘ (आर्गनाईजर, सितंबर 6, 1949)।

भाजपा, एनडीए गठबंधन के सहारे सन् 1998 में सत्ता में आई। उस समय एनडीए सरकार की केबिनेट के एक महत्वपूर्ण सदस्य अरूण शौरी ने अंबेडकर की अत्यंत तीखी निंदा की थी।  वर्तमान सरकार के मंत्री यद्यपि अंबेडकर की मूर्तियों और चित्रों पर माला चढ़ाते नहीं थक रहे हैं परंतु एक केन्द्रीय मंत्री अनंतकृष्ण हेगड़े ने खुलेआम यह घोषणा की है कि भाजपा, संविधान को बदलना चाहती है। अंबेडकर, धर्मनिरपेक्षता और स्वतंत्रता के जबरदस्त पक्षधर थे परंतु उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि धर्मनिरपेक्षता स्वाधीन भारत का सबसे बड़ा झूठ है। भाजपा की रणनीति यही है कि वह एक ओर बाबासाहेब की शान में कसीदे काढ़ती रहे तो दूसरी ओर जाति और लैंगिक समानता के उनके सिद्धांतों को कमजोर करती रहे। बाबासाहेब के विचार क्या थे, यह इसी से स्पष्ट है कि उन्होंने उस मनुस्मृति का दहन किया था, जिस पर संघ परिवार घोर श्रद्धा रखता है।

अंबेडकर, जाति के उन्मूलन के हामी थे क्योंकि उनकी मान्यता थी कि जाति, सामाजिक न्याय की राह में एक बड़ा रोड़ा है। इसके विपरीत, आरएसएस,जातियों के बीच समरसता की बात करता है और यही कारण है कि उसने दलितों में काम करने के लिए सामाजिक समरसता मंच गठित किए हैं। जहां तक जाति के उन्मूलन का प्रश्न है, उस पर संघ परिवार मौन धारण किए हुए है।

भाजपा की राजनीति के केन्द्र में हैं भगवान राम। अगर भाजपा सचमुच अंबेडकर का सम्मान करती होती तो क्या वह भगवान राम को अपनी राजनीति का मुख्य प्रतीक बनाती? भाजपा ने भगवान राम के नाम का प्रयोग कर आम हिन्दुओं को गोलबंद करने का हर संभव प्रयास किया। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने अयोध्या में राम की एक विशाल प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा की है। आजकल रामनवमी का त्यौहार बहुत उत्साह से मनाया जाने लगा है और इस दौरान हथियारबंद युवा जुलूस निकालते हैं। वे इस बात का विशेष ख्याल रखते हैं कि ये जुलूस मुसलमानों के इलाकों से जरूर गुजरें। अंबेडकर, राम के बारे में क्या सोचते थे? वे अपनी पुस्तक‘रिडल्स ऑफ़ हिन्दुइज्म‘ में राम की आलोचना करते हैं। वे कहते हैं कि राम ने शम्बूक को सिर्फ इसलिए मारा क्योंकि वह शुद्र होते हुए भी तपस्या कर रहा था। इसी तरह, राम ने पेड़ के पीछे छुपकर बाली की हत्या की। अंबेडकर, राम की सबसे कटु आलोचना इसलिए करते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल दिया और सालों तक उसकी कोई खोजखबर नहीं ली।

अंबेडकर के चित्रों और उनकी मूर्तियों पर माल्यार्पण करके अंबेडकर को सम्मान नहीं दिया जा सकता। उन्हें सम्मान देने के लिए यह जरूरी है कि हम मनुस्मृति की उनकी आलोचना को स्वीकार करें, भारतीय संविधान के मूल्यों को सम्मान दें और समर्पित भाव से धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के लिए काम करें। भाजपा की नीतियों ने दलितों के विरूद्ध पूर्वाग्रह में वृद्धि की है और उनके खिलाफ हिंसा भी बढ़ी है। पिछले चार साल इसके गवाह हैं। गांधी, नेहरू और कांग्रेस, अंबेडकर से उनकी मत विभिन्नता के बावजूद अंबेडकर और उनके सरोकारों का सम्मान करते थे।

Read More…

पिछले कुछ वर्षों से, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरु की विरासत को नज़रंदाज़ और कमज़ोर करने के अनवरत और सघन प्रयास किये जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में उनका नाम लेने से बचा जा रहा है और कई स्कूली पाठ्यपुस्तकों में से उन पर केन्द्रित अध्याय हटा दिए गए हैं। राष्ट्रीय अभिलेखागार की भारत छोड़ो आंदोलन पर केन्द्रित प्रदर्शनी में उनका नाम तक नहीं है। सत्ताधारी दल के प्रवक्ता,वर्तमान सरकार की असफलताओं के लिए नेहरू की नीतियों को दोषी ठहरा रहे हैं। सोशल मीडिया में उनके बारे में निहायत घटिया बातें कही जा रही हैं। यह बताया जा रहा है कि वे और उनके पुरखे अत्यंत विलासितापूर्ण जीवन जीते थे। ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़-मरोड़कर, विभाजन और कश्मीर समस्या के लिए नेहरू को दोषी ठहराया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने तो यहां तक कह दिया कि नेहरू ने सरदार पटेल के अंतिम संस्कार में हिस्सा नहीं लिया था।

आईए, हम उद्योग, तकनीकी, कृषि, शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्रों में नेहरू के योगदान पर नजर डालें और यह देखें कि आधुनिक भारत के निर्माण में उनका क्या योगदान था। नेहरू, अंतर्राष्ट्रीय मामलों से बहुत अच्छी तरह से वाकिफ थे। वे पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद के विरूद्ध चल रहे संघर्षों के समर्थक थे और नस्लवाद के कड़े विरोधी थे। वे सभी देशों की समानता के पक्षधर थे। जहां तक भारत का प्रश्न है, गांधीजी के जादू से प्रभावित होकर वे स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। कांग्रेस के अध्यक्ष बतौर उन्होंने भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिए जाने की मांग की। वे केवल खादी पहनते थे। स्वाधीनता संग्राम के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और वे कुल मिलाकर 3,269 दिन जेल में रहे। वे एक जिज्ञासु पाठक और प्रतिभाशाली लेखक थे। उनकी आत्मकथा व उनके द्वारा लिखित ‘भारत एक खोज‘ और ‘पिता के पत्र, पुत्री के नाम‘अंतर्राष्ट्रीय साहित्य की अनमोल विरासत हैं। विभाजन का मुद्दा काफी उलझा हुआ था। अंग्रेज, इस देश को दो टुकड़ों में बांटने पर आमादा थे। वे ऐसा इसलिए कर सके क्योंकि सावरकर ने काफी पहले द्विराष्ट्र के सिद्धांत का प्रतिपादन कर दिया था और जिन्ना, अलग इस्लामिक देश की अपनी मांग पर अड़े हुए थे। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में से पटेल वे पहले व्यक्ति थे जिन्हें यह अहसास हो गया था कि देश का विभाजन अपरिहार्य है। नेहरू को इस कड़वे सच को स्वीकार करने में कई और महीने लग गए। कश्मीर के मामले में पटेल ने जूनागढ़ में भाषण देते हुए कहा कि अगर पाकिस्तान हैदराबाद पर अपना दावा छोड़ दे तो भारत, कश्मीर को उसका हिस्सा बनने देगा। शेख अब्दुल्ला के जोर देने पर नेहरू ने कश्मीर के महाराजा के साथ विलय की संधि पर हस्ताक्षर करवाकर, भारतीय सेना को पाकिस्तानी कबाईलियों से मुकाबला करने कश्मीर भेजा।

जहां तक प्रधानमंत्री पद का सवाल है, गांधीजी को देश ने यह अधिकार दिया था कि वे भारत के पहले प्रधानमंत्री को चुनें। गांधीजी को यह अहसास था कि नेहरू को वैश्विक मामलों की बेहतर समझ है और राजनैतिक दृष्टि से वे पटेल की तुलना में उनके अधिक योग्य उत्तराधिकारी सिद्ध होंगे। जहां तक लोकप्रियता का सवाल है, नेहरू, पटेल से कहीं आगे थे। एक बार एक आम सभा में उमड़ी भारी भीड़ के बारे में पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर पटेल ने कहा कि लोग जवाहर को देखने आए हैं,उन्हें नहीं।

आज सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा देने की नेहरू की नीति की आलोचना की जा रही है। यह नीति नेहरू ने अकारण और केवल अपनी इच्छा से नहीं अपनाई थी। बांबे प्लान (1944) के तहत उद्योगपति, सरकार से आधारभूत उद्योगों की स्थापना के लिए सहायता की अपेक्षा कर रहे थे। सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित आधारभूत उद्योगों ने देश की औद्योगिक प्रगति की राह खोली। नोबेल पुरस्कार विजेता पाल कुर्गबेन ने कहा था कि भारत ने तीस साल में जो हासिल किया है, उसे हासिल करने में इंग्लैंड को 150 साल लग गए थे। यह इसलिए हो सका क्योंकि गणतंत्र के शुरुआती वर्षों में नेहरू ने देश को एक मजबूत नींव दी।

शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्रों में उनकी नीतियों के कारण ही आज हम दुनिया के अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा कर पा रहे हैं और भारत एक बड़ी और मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा है। औद्योगीकरण के साथ-साथ, नेहरू ने शिक्षा और विज्ञान पर भी बहुत जोर दिया। आज अगर हम अपनी तुलना उन देशों से करें, जो हमारे साथ ही स्वतंत्र हुए थे, तो हमें पता चलेगा कि विज्ञान और तकनीकी के मामले में हम उनसे कहीं आगे हैं। नेहरू और अंबेडकर ने यह सुनिश्चित  किया कि राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अधीन नागरिकों में वैज्ञानिक समझ का विकास करने की जिम्मेदारी राज्य को सौंपी जाए। नेहरू ने नीति निदेशक तत्वों के इस हिस्से को मूर्त स्वरूप देते हुए आईआईटी, इसरो, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, सीएसआईआर इत्यादि जैसी संस्थाओं की नींव रखी। स्वास्थ्य के क्षेत्र में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसी उत्कृष्ट संस्थाओं की स्थापना की गई।

जब हम स्वाधीन हुए, उस समय देश की साक्षरता दर 14 प्रतिशत और औसत आयु 39 वर्ष थी। आज हम मीलों आगे निकल आए हैं, यद्यपि हमें और आगे जाना है।

सामाजिक स्तर पर नेहरू बहुवाद के हामी थे और धर्मनिरपेक्षता को राज्य की मूल नीतियों का हिस्सा मानते थे।  अपनी इसी प्रतिबद्धता के चलते, विभाजन के बाद हुए कई दंगों में वे हिंसा पर नियंत्रण करने के लिए खुली जीप पर सवार हो खून की प्यासी भीड़ों के बीच गए। सन् 1961 के जबलपुर दंगों के बाद, उन्होंने राष्ट्रीय एकता परिषद का गठन किया। आज के शासकों के विपरीत, वे धार्मिक अल्पसंख्यकों का विश्वास जीत सके। उनके द्वारा स्थापित संस्थाओं जैसे योजना आयोग और राष्ट्रीय एकता परिषद को कमजोर या समाप्त किया जा रहा है। आज देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ रही है और कारपोरेट घरानों को लूट की पूरी छूट मिली हुई है।

क्या उनमें कोई कमियां नहीं थीं? क्या उन्होंने कोई गलती नहीं की? ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। उनके हिस्से में असफलताएं और गलतियां भी थीं। उन्होने चीन पर अगाध विश्वास किया और भारत-चीन युद्ध में हम पराजित हुए। बड़े बांधों के संबंध में उनकी नीति में भी कमियां थीं। परंतु कुल मिलाकर उन्होंने न केवल भारत,बल्कि पूरी दुनिया पर अपनी गहरी और सकारात्मक छाप छोड़ी है।

क्षुद्र सोच से ग्रस्त आज के शासक, नेहरू के योगदान को नजरअंदाज करना चाहते हैं। वे उसे कम कर बताने की कोशिश कर रहे हैं। नेहरू द्वारा स्थापित दो महत्वपूर्ण संस्थाओं योजना आयोग और राष्ट्रीय एकता परिषद को भंग कर दिया गया है। नेहरू आज विघटनकारी और संकीर्ण विचारधारा के निशाने पर हैं। उनके बारे में अगणित झूठ फैलाए जा रहे हैं। सबसे घृणास्पद यह है कि सुनियोजित तरीके से उनके व्यक्तिगत चरित्र, उनके परिवार और उनके योगदान को बदनाम किया जा रहा है। आज जो लोग सरकार में हैं, उनके विचारधारात्मक पूर्वजों ने कभी स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया। उनके पास अपना कहने को कोई नायक है ही नहीं। यही कारण है कि वे सरदार पटेल जैसे कांग्रेस नेताओं पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रहे हैं। विचारधारा के स्तर पर वे नेहरू को अपनी राह में बड़ा रोड़ा पाते हैं। अगर नेहरू की विचारधारा इस देश में जिंदा रहेगी तो वे अपने संकीर्ण लक्ष्यों को कभी हासिल न कर सकेंगे। यही कारण है कि वे नेहरू पर कीचड़ उछाल रहे हैं।

Read More…

इन दिनों कई दलित संगठन, उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उसके आधिकारिक अभिलेखों में भीमराव अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ शब्द जोड़े जाने का विरोध कर रहे हैं। यह सही है कि संविधान सभा की मसविदा समिति के अध्यक्ष बतौर, अंबेडकर ने संविधान की प्रति पर अपने हस्ताक्षर, भीमराव रामजी अंबेडकर के रूप में किए थे। परंतु सामान्यतः, उनके नाम में रामजी शब्द शामिल नहीं किया जाता है। तकनीकी दृष्टि से उत्तरदेश सरकार के इस निर्णय को चुनौती नहीं दी जा सकती परंतु यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यह निर्णय, अंबेडकर को अपना घोषित करने की हिन्दुत्ववादी राजनीति का हिस्सा है। भाजपा के लिए भगवान राम, तारणहार हैं। उनके नाम का इस्तेमाल कर भाजपा ने समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत किया – फिर चाहे वह राममंदिर का मुद्दा हो, रामसेतु का या रामनवमी की पूर्व संध्या पर जानबूझकर भड़काई गई हिंसा का। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से हम भारत में दो विरोधाभासी प्रवृत्तियों का उभार देख रहे हैं। एक ओर दलितों के विरूद्ध अत्याचार बढ़ रहे हैं तो दूसरी ओर, अंबेडकर की जंयतियां जोर-शोर से मनाई जा रही हैं और हिन्दू राष्ट्रवादी अनवरत अंबेडकर का स्तुतिगान कर रहे हैं।

इस सरकार के पिछले लगभग चार वर्षों के कार्यकाल में हमने दलितों के दमन के कई उदाहरण देखे। आईआईटी मद्रास में पेरियार स्टडी सर्किल पर प्रतिबंध लगाया गया, रोहित वेम्यूला की संस्थागत हत्या हुई और ऊना में दलितों पर घोर अत्याचार किए गए। मई 2017, जब योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके थे, में सहारनपुर में हुई हिंसा में बड़ी संख्या में दलितों के घर जला दिए गए। दलित नेता चंद्रशेखर रावण, जमानत मिलने के बाद भी जेल में हैं क्योंकि उन पर आरोप है कि उन्होंने हिंसा भड़काई। दलितों के घरों को आग के हवाले करने की घटना, भाजपा सांसद के नेतृत्व में निकाले गए जुलूस के बाद हुई जिसमें  ‘‘यूपी में रहना है तो योगी-योगी कहना होगा‘‘ व ‘‘जय श्रीराम‘‘ के नारे लगाए जा रहे थे। महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलितों के खिलाफ हिंसा भड़काई गई और जैसा कि दलित नेता प्रकाश अंबेडकर ने कहा है, हिंसा भड़काने वालों के मुख्य कर्ताधर्ता भिड़े गुरूजी को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। भाजपा की केन्द्र सरकार में मंत्री व्ही के सिंह ने सन् 2016 में दलितों की तुलना कुत्तों से की थी और हाल में एक अन्य केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भी ऐसा ही कहा। उत्तरप्रदेश के कुशीनगर में जब योगी आदित्यनाथ मुशहर जाति के लोगों से मिलने जा रहे थे, उसके पूर्व अधिकारियों ने दलितों को साबुन की बट्टियां और शेम्पू बांटे ताकि वे नहा-धोकर साफ-सुथरे लग सकें।

मोदी-योगी मार्का राजनीति की मूल नीतियों और चुनाव में अपना हित साधने की उसकी आतुरता के कारण यह सब हो रहा है। सच यह है कि मोदी-योगी और अंबेडकर के मूल्यों में मूलभूत अंतर हैं। अंबेडकर, भारतीय राष्ट्रवाद के हामी थे। वे जाति का उन्मूलन करना चाहते थे और उनकी यह मान्यता थी कि जाति और अछूत प्रथा की जड़ें हिन्दू धर्मग्रंथों में हैं। इन मूल्यों को नकारने के लिए अंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था। उन्होंने भारतीय संविधान का निर्माण किया, जो स्वाधीनता संग्राम के वैश्विक मूल्यों पर आधारित था। भारतीय संविधान के आधार थे समानता, बंधुत्व, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मूल्य। दूसरी ओर थीं हिन्दू महासभा जैसी संस्थाएं, जिनकी नींव हिन्दू राजाओं और जमींदारों ने रखी थी और जो भारत को उसके ‘गौरवशाली अतीत‘ में वापस ले जाने की बात करती थीं – उस अतीत में जब वर्ण और जाति को ईश्वरीय समझा और माना जाता था। हिन्दुत्ववादी राजनीति का अंतिम लक्ष्य आर्य नस्ल और ब्राम्हणवादी संस्कृति वाले हिन्दू राष्ट्र का निर्माण है। आरएसएस इसी राजनीति का पैरोकार है।

माधव सदाशिव गोलवलकर व अन्य हिन्दू चिंतकों ने अंबेडकर के विपरीत, हिन्दू धर्मग्रंथों को मान्यता दी। सावरकर का कहना था कि मनुस्मृति ही हिन्दू विधि है। गोलवलकर ने मनु को विश्व का महानतम विधि निर्माता निरूपित किया। उनका कहना था कि पुरूषसूक्त में कहा गया है कि सूर्य और चन्द्र ब्रम्हा की आंखें हैं और सृष्टि का निर्माण उनकी नाभि से हुआ। ब्रम्हा के सिर से ब्राम्हण उपजे, उनके हाथों से क्षत्रिय, उनकी जंघाओं से वेश्य और उनके पैरों से शूद्र। इसका अर्थ यह है कि वे लोग जिनका समाज इन चार स्तरों में विभाजित है, ही हिन्दू हैं।

भारतीय संविधान के लागू होने के बाद, आरएसएस के मुखपत्र आर्गनाईजर ने अपने एक संपादकीय में संविधान की घोर निंदा की। आरएसएस, लंबे समय से कहता आ रहा है कि भारतीय संविधान में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। हाल में केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भी यही बात कही। जब अंबेडकर ने संसद में हिन्दू कोड बिल प्रस्तुत किया था, तब उसका जबरदस्त विरोध हुआ था। दक्षिणपंथी ताकतों ने अंबेडकर की कड़ी निंदा की थी। परंतु अंबेडकर अपनी बात पर कायम रहे। उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हें न केवल शास्त्रों को त्यागना चाहिए बल्कि उनकी सत्ता को भी नकारना चाहिए, जैसा कि बुद्ध और नानक ने किया था। तुम में यह साहस होना चाहिए कि तुम हिन्दुओं को यह बताओ कि उनमें जो गलत है वह उनका धर्म है – वह धर्म, जिसने जाति की पवित्रता की अवधारणा को जन्म दिया है‘‘।

आज क्या हो रहा है? आज अप्रत्यक्ष रूप से जाति प्रथा को औचित्यपूर्ण ठहराया जा रहा है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष वाई. सुदर्शन ने हाल में कहा था कि इतिहास में किसी ने जाति प्रथा के विरूद्ध कभी कोई शिकायत नहीं की और इस प्रथा ने हिंदू समाज को स्थायित्व प्रदान किया। एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को कमजोर करना और विश्वविद्यालयों में इन वर्गों व ओबीसी के लिए पदों में आरक्षण संबंधी नियमों में बदलाव, सामाजिक न्याय और अंबेडकर की विचारधारा पर सीधा हमला हैं।

जैसे-जैसे हिन्दू राष्ट्रवाद की आवाज बुलंद होती जा रही है उसके समक्ष यह समस्या भी उत्पन्न हो रही है कि वह दलितों की सामाजिक न्याय पाने की महत्वाकांक्षा से कैसे निपटे। हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति, जाति और लैंगिक पदक्रम पर आधारित है। इस पदक्रम का समर्थन आरएसएस चिंतक व संघ परिवार के नेता करते आ रहे हैं। उनके सामने समस्या यह है कि वे इन वर्गों की महत्वाकांक्षाएं पूरी नहीं करना चाहते परंतु चुनावों में उनके वोट प्राप्त करना चाहते हैं। इसी कारण वे एक ओर दलितों के नायक बाबा साहब अंबेडकर को अपना सिद्ध करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं तो दूसरी ओर, दलितों को अपने झंडे तले लाने की कोशिश में भी लगे हुए हैं। वे चाहते हैं कि दलित, भगवान राम और पवित्र गाय पर आधारित उनके एजेंडे को स्वीकार करें।

यह एक अजीबोगरीब दौर है। एक ओर उन सिद्धांतों और मूल्यों की अवहेलना की जा रही है, जिनके लिए अंबेडकर ने जीवन भर संघर्ष किया तो दूसरी ओर उनकी अभ्यर्थना हो रही है। और अब तो अंबेडकर के नाम का उपयोग भी हिन्दुत्ववादी शक्तियां, राम की अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहती हैं।   

Read More…

महाराष्ट्र के कोरेगांव में एक जनवरी 2018 को उन दलित सिपाहियों, जो सन् 1818 में पेशवा के खिलाफ युद्ध में अंग्रेजों की ओर से लड़ते हुए मारे गए थे, को श्रद्धांजलि देने के लिए इकट्ठा हुए दलितों के खिलाफ अभूतपूर्व हिंसा हुई।  सन् 1927 में अंबेडकर ने कोरेगांव जाकर इन शहीदों को अपनी श्रद्धांजलि दी थी। दलितों द्वारा हर साल भीमा कोरेगांव में इकट्ठा होकर मृत सैनिकों को श्रद्धांजलि देना,दलित पहचान को बुलंद करने के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा है। इस साल यह समारोह बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया क्योंकि इस युद्ध के 200 साल पूरे हो रहे थे। विवाद एक दलित – गोविंद गायकवाड़ – जिसके बारे में यह कहा जाता है कि उसने संभाजी का अंतिम संस्कार किया था – की समाधि को अपवित्र किए जाने से शुरू हुआ। भगवा झंडाधारियों ने उन दलितों पर पत्थर फेंके जो भीमा कोरेगांव मे इकट्ठा हुए थे। शिवाजी प्रतिष्ठान और समस्त हिन्दू अगादी नामक हिन्दुत्व संगठन इस हिंसा के अगुआ थे।

पुणे के शनिवारवाड़ा, जो पेशवाओं के राज का केन्द्र था, में एक सभा को संबोधित करते हुए दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने ‘आधुनिक पेशवाई‘ के खिलाफ संघर्ष शुरू करने का आव्हान किया। ‘आधुनिक पेशवाई‘ से उनका आशय भाजपा-आरएसएस की राजनीति से था। जिस सभा में उन्होंने भाषण दिया, वहां दलितों के साथ-साथ अन्य समुदायों के नेता भी उपस्थित थे। इस घटना पर विभिन्न प्रतिक्रियाएं हुईं। कुछ लोग इसे मराठा विरूद्ध दलित संघर्ष बता रहे हैं तो कुछ का कहना है कि यह दलितों पर हिन्दुत्ववादी ताकतों का हमला है। एक ट्वीट में राहुल गांधी ने इस घटना के लिए भाजपा की फासीवादी व दलित-विरोधी मानसिकता को दोषी ठहराया।

भीमा कोरेगांव युद्ध का इतिहास, समाज में व्याप्त कई मिथकों को तोड़ता है । इस युद्ध में एक ओर थे अंग्रेज, जो अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहते थे, तो दूसरी ओर थे पेशवा, जो अपने राज को बचाना चाहते थे। अंग्रेजों ने अपनी सेना में बड़ी संख्या में दलितों को भर्ती किया था। इनमें महाराष्ट्र के महार, तमिलनाडू के पार्या और बंगाल के नामशूद्र शामिल थे। अंग्रेजों ने उन्हें अपनी सेना में इसलिए शामिल किया था क्योंकि वे अपने नियोक्ताओं के प्रति वफादार रहते थे और आसानी से उपलब्ध थे। पेशवा की सेना में अरब के भाड़े के सैनिक शामिल थे। इससे यह साफ है कि मध्यकालीन इतिहास को हिन्दू बनाम मुस्लिम संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जाना कितना गलत है। जहां इब्राहिम खान गर्दी, शिवाजी की सेना में शामिल थे वहीं बाजीराव पेशवा की सेना में अरब सैनिक थे। दुर्भाग्यवश, आज हम अतीत को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देख रहे हैं और इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं कि युद्धों का उद्देश्य केवल और केवल संपत्ति और सत्ता हासिल करना था।

बाद में अंग्रेजों ने दलितों और महारों को अपनी सेना में भर्ती करना बंद कर दिया क्योंकि उन्होंने पाया कि ऊँची जातियों के सिपाही अपने दलित अफसरों को सेल्युट करने और उनसे आदेश लेने के लिए तैयार नहीं थे। अंबेडकर का प्रयास यह था कि दलितों की ब्रिटिश सेना में भर्ती जारी रहे और इसी सिलसिले में उन्होंने यह सुझाव दिया कि सेना में अलग से महार रेजिमेंट बनाई जानी चाहिए। महार सिपाहियों के पक्ष में अंबेडकर इसलिए खड़े हुए क्योंकि वे चाहते थे कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में दलितों की मौजूदगी हो।

क्या भीमा कोरेगांव युद्ध दलितों द्वारा पेशवाई को समाप्त करने का प्रयास था? यह सही है कि पेशवाओं का शासन घोर ब्राम्हणवादी था। शूद्रों को अपने गले में एक मटकी लटकाकर चलना पड़ता था और उनकी कमर में एक झाड़ू बंधी रहती थी ताकि वे जिस रास्ते पर चलें, उसे साफ करते जाएं। यह जातिगत भेदभाव और अत्याचार का चरम था। क्या अंग्रेज, बाजीराव के खिलाफ इसलिए लड़ रहे थे क्योंकि वे पेशवाओं के ब्राम्हणवाद का अंत करना चाहते थे? कतई नहीं। वे तो केवल अपने साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार करने के इच्छुक थे ताकि उनका व्यापार और फले-फूले और उन्हें भारत को लूटने के और अवसर उपलब्ध हो सकें। इसी तरह, महार सिपाही, पेशवा के खिलाफ इसलिए लड़े क्योंकि वे अपने नियोक्ता अर्थात अंग्रेजों के प्रति वफादार थे। यह सही है कि इसके कुछ समय बाद देश में समाज सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई और उसका कारण थी आधुनिक शिक्षा। अंग्रेजों ने देश में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था इसलिए लागू की ताकि प्रशासन के निचले पायदानों पर काम करने के लिए लोग उन्हें उपलब्ध हो सकें। समाज सुधार इस प्रक्रिया का अनायास प्रतिफल था। अंग्रेज़ भारत की सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए अपनी नीतियां नहीं बनाते थे। वैसे भी, उस दौर में जातिगत शोषण के प्रति उस तरह की सामाजिक जागृति नहीं थी जैसी कि बाद में जोतिबा फुले के प्रयासों से आई।

यह कहना कि पेशवा राष्ट्रवादी थे और दलित, ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर साम्राज्यवादी शक्तियों का समर्थन कर रहे थे, बेबुनियाद है। राष्ट्रवाद की अवधारणा ही औपनिवेशिक शासनकाल में उभरी। ब्रिटिश शासन के कारण देश में जो सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन आए, उनके चलते दो तरह के राष्ट्रवाद उभरे। पहला था भारतीय राष्ट्रवाद, जो उद्योगपतियों, व्यापारियों, शिक्षित व्यक्तियों,  श्रमिकों और पददलित तबके के नए उभरते वर्गों की महत्वाकांक्षाओं की अभिव्यक्ति था। दूसरे प्रकार का राष्ट्रवाद धर्म पर आधारित था – हिन्दू राष्ट्रवाद और मुस्लिम राष्ट्रवाद। इसके प्रणेता थे जमींदार और राजा-नवाब, जो समाज में प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति बढ़ते आकर्षण से भयातुर थे और धर्म के नाम पर अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहते थे।

पिछले कुछ वर्षों में देश में दलितों के बीच असंतोष बढ़ा है। इसको पीछे कई कारण हैं। रोहित वेम्युला की संस्थागत हत्या और ऊना में दलितों की निर्मम पिटाई इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। वर्तमान सरकार की नीतियां, दलितों को समाज के हाशिए पर धकेल रहीं हैं – फिर चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो या शिक्षा का क्षेत्र। कोरेगांव में भारी संख्या में दलितों का इकट्ठा होना इस बात का प्रतीक है कि वर्तमान स्थितियों से वे गहरे तक असंतुष्ट हैं। नए उभरे दलित संगठन समाज के अन्य दमित वर्गों के साथ गठजोड़ कर रहे हैं। भीमा कोरेगांव में हुई घटनाओं के बाद धार्मिक अल्पसंख्यकों, श्रमिकों और कई अन्य सामाजिक संगठनों ने दलितों के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित की। दलित, अतीत के नायकों से प्रेरणा ग्रहण करने का प्रयास कर रहे हैं। हालिया घटनाक्रम से यह साफ है कि वे भारतीय प्रजातंत्र में अपना यथोचित स्थान पाने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं। उन पर हिन्दू दक्षिणपंथी समूहों का आक्रमण, दलितों की महत्वाकांक्षाओं को दबाने और कुचलने का प्रयास है।  

Read More…

हर्ष मंदर के लेख (द इंडियन एक्सप्रेस, मार्च 7, 2018) “सोनिया सेडली” और रामचंद्र गुहा के उसके प्रतिउत्तर में इसी समाचारपत्र में प्रकशित आलेख “लिबरल्स ओ” ने भारत में मुस्लिम समुदाय की स्थिति और उसमें सुधार की प्रक्रिया पर नए सिरे से एक बहस शुरू कर दी है।  यद्यपि इस प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं तथापि उन्हें मोटे तौर पर दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है – एक, समुदाय के अन्दर और दूसरा, समुदाय के बाहर – और इन दोनों के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव परिलक्षित हो रहे हैं। इन दोनों के जटिल संयुक्त प्रभाव से ही समय के साथ किसी भी समुदाय में परिवर्तन आते हैं। जहाँ मंदर का फोकस मुस्लिम समुदाय पर पड़ने वाले बाहरी नकारात्मक प्रभावों पर है वहीं रामचंद्र गुहा, समुदाय के भीतर के कारकों पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। 

पिछले कुछ दशकों में मुस्लिम समुदाय में आंतरिक तौर पर जो कुछ हो रहा है, उसे समझना इसलिए ज़रूरी है ताकि हम यह जान सकें कि हामिद दलवई और आरिफ मोहम्मद खान जैसे सुधारक क्यों कुछ विशेष नहीं कर सके। समुदाय में सुधार की प्रक्रिया, मुख्यतः उसमें व्याप्त असुरक्षा के भाव के कारण बाधित हो रही है। इस भाव के बढ़ने के दो कारण हैं – पहला, राष्ट्रीय स्तर पर सांप्रदायिक हिंसा, जिसके कारण इस समुदाय को जान-माल और रोज़गार का बहुत नुकसान हो रहा है। दूसरा, कई तरीकों से इस समुदाय को आर्थिक दृष्टि से हाशिए पर धकेला जा रहा है। इन दोनों कारणों से यह समुदाय दकियानूसी विचारों को गले लगा रहा है और रूढ़िवादी मौलानाओं का दबदबा बढ़ता जा रहा है।

वैश्विक स्तर पर तेल के संसाधनों पर नियंत्रण की राजनीति के चलते, इस्लाम के नाम पर आतंकवाद का उदय हुआ और उससे उभरा वैश्विक स्तर पर इस्लाम के प्रति भय का भाव और मुसलमानों का दानवीकरण करने की प्रक्रिया। आज मुस्लिम पहचान को समाज के लिए एक खतरे की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। इन दोनों के कारण हमारे देश में भी कट्टरपंथी नेतृत्व का मुस्लिम समाज पर नियंत्रण और प्रभाव बढ़ा है। बहुत पहले, सन् 1992-93 की मुंबई हिंसा के बाद, मैंने अचानक पाया कि मेरे मार्गदर्शन में शोध कर रहे अध्येता, दिन में कई बार मस्जिद जाने लगे और मेरे एक साथी शिक्षक ने अपने उपनाम, जो पहले उनके धर्म को इंगित नहीं करता था की जगह ऐसे उपनाम का प्रयोग करना शुरू कर दिया जिससे यह साफ हो जाता था कि वे मुसलमान हैं। आईआईटी मुंबई के परिसर में निवास करते हुए मैंने देखा कि गुजरात के सन् 2002 के कत्लेआम के बाद केम्पस में मुस्लिम लड़कियां जो तब तक सलवार-कमीज या पेंट और शर्ट पहनती थीं, अचानक बुर्का ओढ़ने लगीं।

मक्का मस्जिद, मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस और अजमेर में हुए बम विस्फोटों के बाद, पुलिस ने तुरत-फुरत बड़ी संख्या में मुसलमान युवकों को हिरासत में ले लिया और अदालतों से बरी होने के पूर्व, उन्हें कई साल सीखचों के पीछे गुजारने पड़े। इससे भी सुधार की प्रक्रिया बाधित हुई। शिक्षा प्राप्त करने के लिए मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा हिस्सा बहुत आतुर था परन्तु बाटला हाउस मुठभेड़ और आजमगढ़ और भटकल जैसे स्थानों के दानवीकरण ने शिक्षा को उनकी प्राथमिकता नहीं बनने दिया।

इस परेशानहाल समुदाय में सुधार की प्रक्रिया कैसे सफल हो सकती है? जैसा कि हर्ष मंदर ने लिखा है, इस समुदाय का संपूर्ण राजनैतिक हाशियाकरण हो चुका है। सांप्रदायिक दंगों के चलते वे अपने मोहल्लों में सिमट गए हैं। सन 1992-93 की हिंसा के बाद मुंबई के नज़दीक मुम्बरा अस्तित्व में आया तो 2002 के बाद, जुहापुरा। किसी डरे-सहमे और अपने में सिमटे समुदाय में किस हद तक सुधर लाया जा सकता है? कई विवेकशील और प्रबुद्ध मुसलमानों ने अपने समुदाय में शिक्षा को प्रोत्साहन देने के सघन प्रयास किए। अपनी एक अमरीका यात्रा के दौरान मुझे कई ऐसे मुसलमानों से मिलने का मौका मिला जो वहां अलग-अलग पेशों में थे। वे सब इस बारे में एकमत थे कि भारतीय मुसलमानों में शिक्षा को प्रोत्साहन दिए जाने के ज़रुरत है और वे इसके लिए भी तैयार थे कि वे भारत में इस समुदाय के लिए शिक्षण संस्थाओं की स्थापना में आर्थिक सहयोग उपलब्ध करवाएं और युवा मुसलमान लड़कों व लड़कियों के लिए वजीफों की व्यवस्था करें। इससे उन प्रयासों को मजबूती मिलेगी जो गुजरात में जेएस बंदूकवाला और देश भर में मुसलमानों की कई संस्थाएं कर रहीं हैं।

आज देश में दक्षिणपंथ का जोर बढ़ रहा है और चुनाव जीतने के लिए नेताओं को अपने हिन्दू होने का दंभ भरना आवश्यक हो गया है। इसके साथ ही, “जो लोग भारत में रह रहे हैं, वे सब हिन्दू हैं” (मोहन भगवत) जैसे दावे, मुसलमानों को आतंकित कर रहे हैं। इसी के चलते असगर अली इंजीनियर जैसे लोग, जिन्होंने इस्लाम का मानवतावादी चेहरा दुनिया के सामने रखने का प्रयास किया और समुदाय में सुधार की नींव रखी, उन्हें मुख्यधारा से बाहर कर दिया गया। मुस्लिम समुदाय आज एक दुविधा में फंसा हुआ है। उसका केवल राजनैतिक हाशियाकरण ही नहीं हुआ है बल्कि उसे घृणा का पात्र बना दिया गया है। इसके लिए इतिहास के साम्प्रदायिक संस्करण का उपयोग किया गया और यह दिखाने का प्रयास किया गया कि हिन्दू, मुस्लिम राजाओं के हाथ प्रताड़ित हुए थे।

जहां तक हामिद दलवई या आरिफ मोहम्मद खान जैसे लोगों का सवाल है, उनके प्रयासों की सराहना करने में हम गुहा के साथ हैं परंतु हम सबको यह भी समझना होगा कि मुस्लिम समुदाय को एक कोने में ढकेला जा रहा है। आज भी देश के विभाजन और कश्मीर की समस्या के लिए उन्हें दोषी ठहराया जाता है। पिछले एक दषक में मेरे कई मुस्लिम मित्र, जिन्हे मैं कभी उनके धर्म की दृष्टि से देखता ही नहीं था, भी यह सवाल उठाने लगे हैं कि आज भारत में मुसलमान होने का क्या अर्थ है। मुसलमानों की उदारवादी परंपरा, जिसमें खान अब्दुल गफ्फार खान से लेकर जाकिर हुसैन, उस्ताद बिस्मिल्ला खान, साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी और जावेद अख्तर जैसे लोग शामिल हैं, आज भी जिंदा है परंतु समस्या यह है कि उनके समुदाय में उनकी सीमित स्वीकार्यता है।

आज भी ’मुस्लिम्स फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी’ और ’माडरेट मुस्लिमस’ जैसे संगठन, इस्लाम के मुल्ला संस्करण के विरूद्ध आवाज उठा रहे हैं। जिस सवाल पर हमें विचार करना चाहिए वह यह है कि सज्जनता, विवेक और तर्क की इन आवाजों को मुस्लिम समुदाय में तव्वजो क्यों नहीं मिल रही है। क्या कारण है कि यह समुदाय अब भी रूढ़िवाद की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। यह भी दिलचस्प है कि आज हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रभाव में आकर और वर्तमान सत्ताधारियों की सोच के चलते,बहुसंख्यक समुदाय भी आस्था और सच, मिथक और यथार्थ के बीच का भेद भुलाता जा रहा है। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि हामिद दलवई जैसे लोग जो सुधार के प्रति प्रतिबद्ध थे और असगर अली इंजीनियर जैसे व्यक्तित्व जो इस्लाम का मानवतावादी चेहरा लोगों के सामने ला रहीं थीं, की आवाज सुनी और समझी जाएगी। यह भी आवश्यक है कि हिन्दू राष्ट्रवाद के बढ़ते कदमों को रोका जाए क्योंकि वही समाज में इस समुदाय के प्रति घृणा उत्पन्न कर रहा है और इसे हाशिए पर ढकेल रहा है।

Read More…

प्रकृति के नियममानव समाज पर लागू नहीं किए जा सकते। परंतु कई बार इनका इस्तेमाल सामाजिक ज़लज़लों का कारण स्पष्ट करने या उनका औचित्य सिद्ध करने के लिए किया जाता है। ‘‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती है’’ (1984 के सिक्ख कत्लेआम के बादऔर ‘‘हर क्रिया की समान व विपरीत प्रतिक्रिया होती है’’ (2002 के गुजरात दंगों के दौरान), इसके दो प्रसिद्ध उदाहरण हैं। मैं पिछले करीब एक माह से इस बात से हैरान हूं कि जिन विद्वानों और लेखकों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटायें हैं उनसे यह पूछा जा रहा है कि उन्होंने यह तब क्यों नहीं किया था जब आपातकाल लगाया गया था या सिक्खविरोधी दंगे हुए थे या कश्मीर से पंडितों ने पलायन किया था या मुंबई ट्रेन धमाकों में सैंकड़ों मासूमों ने अपनी जानें गवाईं थीं।

मुझे भौतिकी का ‘‘क्वालिटेटिव ट्रांसफार्मेशन’’ (गुणात्मक रूपांतरका सिद्धांत याद आता हैजिसके अनुसार पानी को गर्म या ठण्डा करने पर तापमान में बिना कोई परिवर्तन के पानी या तो भाप बन जाता है या बर्फ।

जब डाक्टर दाभोलकरकामरेड पंसारे और फिर प्रोकलबुर्गी की हत्याएं हुईं तभी से खतरे के संकेत मिलने लगे थे। परंतु गौमांस के मुद्दे को लेकर मोहम्मद अखलाक की पीटपीटकर हत्या ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि हमारा समाज एकदम बदल गया है। इसके बाद साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लौटाने का क्रम शुरू हुआ। राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरस्कार लौटाए गए। यह समाज में बढ़ती असहिष्णुता के प्रति विरोध का प्रदर्शन था। इसी दौरान और इसके बादउतनी ही भयावह घटनाएं हुईं। एक ट्रक चालक को इस संदेह में मार डाला गया कि वह वध के लिए गायों को ढो रहा था। भाजपा विधायकों ने कश्मीर विधानसभा में एक विधायक की पिटाई लगाई और देश के कई हिस्सों में गौमांस खाने के मुद्दे को लेकर मुसलमानों पर हमले हुए। आज हमारे देश में हालात ऐसे हो गए हैं कि कोई भी व्यक्ति यदि मटन या कोई और मांस देखकर यह कह भर दे कि यह गौमांस हैतोहिंसाशुरूहोजाएगी।देशमेंऐसामाहौलबनगयाहैकिअगरकोईगायहमारेबगीचेमेंघुसकरपौधोंकोचरनेभीलगेतोउसेभगानेमेंहमेंडरलगेगा।

वातावरण में ज़हर घुलने से सामाजिक सोच में भी बदलाव आया है। अल्पसंख्यकों में असुरक्षा के भाव में तेज़ी से बढोत्तरी हुई है। हम सब जानते हैं कि एनडीए के शासन में आने के बाद सेज़हर उगलने वाले अतिसक्रिय हो गए हैं। हर एक अकबरूद्दीन ओवैसी के पीछे दर्जनों साक्षी महाराजसाध्वियां और योगी हैं। इन भगवा वस्त्रधारीहिंदू राष्ट्रवादियों की सेना को संघ परिवार में उच्च स्थान प्राप्त है। प्रधानमंत्री ने स्वयं हिंदू युवकों का आह्वान किया है कि वे महाराणा प्रताप के रास्ते पर चलते हुए गौमाता के सम्मान की रक्षा करें। पिछले लगभग एक वर्ष में हरामज़ादे जैसे शब्दों का सार्वजनिक मंचों से इस्तेमाल आम हो गया है। केवल संदेह के आधार पर पुणे के एक आईटी कर्मचारी को मौत के घाट उतार दिया गयाचर्चों पर हुए श्रृंखलाबद्ध हमलों को चोरियां बताया गयालवजिहाद के भूत को जिंदा रखा गया और उत्तरप्रदेश के शीर्ष भाजपा नेता योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अगर एक हिंदू लड़कीकिसीमुसलमानसेशादीकरतीहैतोउसकेबदलेहिंदुओंकोसौमुसलमानलड़कियोंकोपकड़करलेआनाचाहिए।मुस्लिमयुवकोंकेनवरात्रिपरहोनेवालेगरबाउत्सवोंमेंभागलेनेपरप्रतिबंधलगादियागया।भाजपाकेमुस्लिमचेहरेमुख्तारअब्बासनकवीनेफरमायाकिजोलोगगौमांसखानाचाहतेहैंवेपाकिस्तानचलेजाएं।महात्मागांधीकेहत्यारेनाथूरामगोडसेकामहिमामंडनऔरजोरशोरसेशुरूहोगयाऔरउसकेमंदिरबनाएजानेकेप्रस्तावसामनेआनेलगे।केरलकेएकभाजपासांसदनेकहाकिगोडसेनेकामतोठीककियाथापरंतुउसनेगलतव्यक्तिकोअपनानिशानाबनाया।पिछलेएकवर्षमेंसाम्प्रदायिकहिंसामेंभीतेजीसेवृद्धिहुई।

पुरस्कार लौटाने का सिलसिला शुरू होने के बादभाजपा के नेतृत्व ने उन कारणों पर ध्यान देने की बजाएजिनके चलते पुरस्कार लौटाए जा रहे थेसंबंधित लेखकों व विद्वानों को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश शुरू कर दी। इन लेखकों का मज़ाक बनाने के लिए ‘‘बुद्धि शुद्धि पूजा’’ के आयोजन हुए और भाजपा के प्रवक्ता टीवी कार्यक्रमों में उन्हें अपमानित करने और उनका मज़ाक उड़ाने में कोई कसर बाकी नहीं रख रहे हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्रीजो कि एक पुराने आरएसएस प्रचारक हैंनेकहाकिमुसलमानभारतमेंरहसकतेहैंपरंतुउन्हेंगौमांसखानाबंदकरनाहोगा।ऐसाबतायाजाताहैकिभाजपाअध्यक्षअमितशाहनेइननेताओंकोबुलाकरडांटपिलाई।परंतुयहसबनाटकप्रतीतहोताहैक्योंकिइननेताओंनेयहदावाकियाकिवेअपनेअध्यक्षसेकिसीऔरकामकेसंबंधमेंमिलनेआएथेऔरइनमेंसेकिसीनेभीनतोअपनेकथनोंपरखेदव्यक्तकियाऔरनाहीमाफीमांगी।

इस घटनाक्रम से व्यथित राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने तीन मौकों पर राष्ट्र का आह्वान किया कि बहुवादसहिष्णुता और हमारे देश की सभ्यता के मूल्यों की रक्षा की जानी चाहिए। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने सरकार को याद दिलाया कि नागरिकों के ‘‘जीवन के अधिकार’’ की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है। बदलते हुए सामाजिक वातावरण पर देश के दो प्रतिष्ठित नागरिकों की टिप्पणियां काबिलेगौर हैं। जूलियो रिबेरो ने अपने दर्द को बयां करते हुए कहा कि ‘‘मैं ईसाई हूं और मैं अचानक मेरे अपने देश में अपने आपको अजनबी पा रहा हूं’’ जानेमाने कलाकार नसीरूद्दीन शाह ने कहा कि ‘‘मैं अब तक अपनी मुसलमान बतौर पहचान से वाकिफ ही नहीं था’’

ये सामान्य दौर नहीं है। बहुवाद और सहिष्णुता के मूल्यों को हाशिए पर धकेला जा रहा है। इस सरकार के राज में आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों ने अपने पंख फैला दिए हैं और वे कुछ भी करने पर उतारू हैं। अब साम्प्रदायिकता का मतलब केवल दंगों में कुछ लोगों की हत्या नहीं रह गया है। उसका बहुत विस्तार हो गया है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के बारे में मिथक प्रचारित किए जा रहे हैं। ऐतिहासिक घटनाओं और वर्तमान समाज के चुनिंदा पहलुओं की मानवविरोधी व्याख्याएं की जा रही हैं। इनका इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैलाने के लिए किया जा रहा है और दंगे भड़काए जा रहे हैं। हिंसा बड़े पैमाने पर हो सकती हैजैसी कि गुजरातमुंबईभागलपुर या मुजफ्फरनगर में हुई या फिर जैसा कि दादरी में हुआकिसी एक व्यक्ति को चुनकर उसकी जान ली सकती है। इससे समाज बंटता है और धीरेधीरेध्रुवीकृतहोताजाताहै।यहीध्रुवीकरणउसपार्टीकीसत्तापानेमेंमददकरताहैजोधर्मकेनामपरराष्ट्रकानिर्माणकरनाचाहतीहै।येलविश्वविद्यालयकेएकअध्ययनमेंकहागयाहैकिसाम्प्रदायिकहिंसासेभाजपाकोचुनावोंमेंफायदाहोताहै।

भारत में सांप्रदायिकता के बीज करीब डेढ़ शताब्दी पूर्व बोए गए थे। अंग्रेज़ों ने अपनी फूट डालो और राज करो की नीति को लागू करने के लिए इतिहास के साम्प्रदायिक लेखन का इस्तेमाल किया। इतिहास की इसी व्याख्या को साम्प्रदायिक संगठनों ने अपना लिया और उसे हिंदूविरोधी या मुस्लिमविरोधी जामा पहना दिया। हिंसा की हर घटना के बाद इन संगठनों की ताकत में इजाफा होता है। साम्प्रदायिकता अपने चरम पर है। मंदिर तोड़ने से लेकर लवजिहाद और उससे लेकर गौमांस का इस्तेमाल घृणा को और गहरा करने के लिए किया जा रहा है। जो लोग यह सब कर रहे हैंवे जानते हैं कि वे सुरक्षित हैं क्योंकि वे ठीक वही कर रहे हैं जो वर्तमान सरकार चाहती हैफिरचाहेसरकारकेनुमांइदेसार्वजनिकतौरपरकुछभीकहें।

एक ओर हिंदू राष्ट्रवाद सरकार का पथप्रदर्शक बना हुआ है तो दूसरी ओर इसी विचारधारा में विश्वास रखने वाले ‘‘कट्टरपंथी’’ तत्व हैं। इन दोनों का विस्तृत जाल है और उनकी पहुंच हर जगह तक है। सत्ताधारी पार्टी को लाभ यह है कि उसे अपने हाथ गंदे नहीं करने पड़ रहे हैं और विभिन्न संगठन व व्यक्ति उसके एजेण्डे को स्थानीय स्तर पर लागू कर रहे हैं। इन ‘‘कट्टरपंथी’’ तत्वों के देश की राजनीति के रंगमंच के केंद्र में आ जाने से स्थिति में ‘‘गुणात्मक’’ परिवर्तन आया है। पुरस्कारों को लौटाने का सिलसिलासमाज के अतिसाम्प्रदायिकीकरण का नतीजा है। असहिष्णुता तेजी से बढ़ रही हैबहुवाद पर हमला हो रहा है और अल्पसंख्यक भयभीत हैं। सवाल यह है कि हम इस दौर में भारतीय संविधान के मूल्यों की रक्षा कैसे करेंगे? (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

05 सितंबर 2015

गत 30 अगस्त 2015 को प्रोफेसर मलीशप्पा माधीवलप्पा कलबुर्गी की हत्या से देश के उन सभी लोगों को गहरा सदमा पहुंचा है जो उदारवादी समाज के हामी हैंतार्किकता के मूल्यों का आदर करते हैं और अंधश्रद्धा के खिलाफ हैं। प्रोफेसर कलबुर्गीजानेमाने विद्वान थे और उन्होंने 100 से भी अधिक पुस्तकें लिखीं थीं। वे 12वीं सदी के कन्नड़ संत कवि बस्वना की विचारधारा को जनता के सामने लाए। वे मानते थे कि लिंगायत – जो कि बस्वना के अनुयायी हैं – को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि वे वैदिक परंपरा का हिस्सा नहीं हैं। बस्वना के छंदों में निहित शिक्षाओंजिन्हें ‘‘वचना’’ कहा जाता है,

काउन्होंनेगहराईसेअध्ययनकियाथाऔरइसनेउनकीतार्किकतावादीसोचकोगढ़नेमेंमहत्वपूर्णभूमिकाअदाकीथी।

कलबुर्गी द्वारा बस्वना की शिक्षाओं का प्रचारप्रसार और मूर्तिपूजा व ब्राह्मणवादी धार्मिक अनुष्ठानों की उनकी खिलाफत ने बजरंग दल जैसे हिंदुत्ववादी संगठनों को उनका शत्रु बना दिया। तथ्य यह है कि पुरातनकाल से नास्तिकतावादी परंपराहिंदूधर्मकाहिस्सारहीहै।इसपरंपराकेएकप्राचीनउपासकथेचार्वाक।मूर्तिपूजाकाविरोधभीहिंदूधर्मकेलिएकोईनईबातनहींहै।आर्यसमाजकेसंस्थापकस्वामीदयानंदसरस्वतीनेमूर्तिपूजानकरनेकाआह्वानकियाथा।

कलबुर्गी की हत्या से कुछ समय पहलेपड़ोसी बांग्लादेश में तीन धर्मनिरपेक्ष युवा ब्लॉगर्स की हत्या कर दी गई थी। सीरिया में इस्लामिक स्टेट के कट्टरवादियों ने खालिद अलअसद नामक अध्येता को जान से मार दिया था। महाराष्ट्र में लगभग दो वर्ष पहलेप्रसिद्ध तार्किकतावादी डॉनरेंद्र दाभोलकर की हत्या ने पूरे देश में हलचल पैदा कर दी थी। उनके प्रयासों से ही महाराष्ट्र में काला जादू और अंधश्रद्धा विरोधी कानून लागू हुआ था। एक अन्य सम्मानित कार्यकर्ता कामरेड गोविंद पंसारे को लगभग एक वर्ष पहले मौत के घाट उतार दिया गया था। पंसारे जिन कई क्षेत्रों में सक्रिय थेअंधश्रद्धा का विरोध उनमें से एक था। महाराष्ट्र में अत्यंत सम्मान से देखे जाने वाले शासक शिवाजी पर उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी जो खासी लोकप्रिय हुई थी। पंसारे अपनी पुस्तक में बताते हैं कि शिवाजी किसानों के हितैषी थे व सभी धर्मों का सम्मान करते थे। शिवाजी के चरित्र का यह प्रस्तुतिकरणहिंदुत्ववादियोंकोरासनहींआया।

डॉकलबुर्गी की हत्याधारवाड़ में उनके घर पर हुई। प्रोफेसर कलबुर्गी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे हंपी स्थित कन्नड़ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति थे। वे राष्ट्रीय और कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कारों के विजेता थे। इस विद्वान प्राध्यापक ने वीरशैव व बस्वना परंपरा का विशद अध्ययन किया था। विवादों ने उनका कभी पीछा नहीं छोड़ा और ना ही कट्टरपंथियों की धमकियों ने। वीरशैव व बस्वना सहित कन्नड़ लोकपरंपरा पर आधारित आलेखों का उनका संग्रह ‘मार्ग’ सबसे पहले विवादों के घेरे में आया। उन्हें कई बार जान से मारने की धमकियाँ मिलीं। उन्हें पुलिस सुरक्षा प्रदान की गयीजिसेउनकेहीअनुरोधपरकुछसमयपहलेवापसलेलियागया।उन्होंनेमूर्तिपूजाबंदकरनेकेमुद्देपरयूआरअनंथमूर्तिकासमर्थनकियाथा।उनकेद्वाराविहिपनेताओंऔरविश्वेश्वरतीर्थस्वामीकोसार्वजनिकबहसकेलिएनिमंत्रितकरनेसेएकनएविवादकाजन्महुआ।कर्नाटकसरकारकेअन्धविश्वासविरोधीविधेयककासमर्थनकरनेकेकारणउन्हेंबजरंगदलजैसेसंगठनोंकेकोपकाशिकारबननापड़ा।उनकाजमकरविरोधहुआऔरकईस्थानोंपरउनकेपुतलेजलायेगए।

दाभोलकरपंसारे और कलबुर्गी की हत्याओं में कई समानताएं हैं। यद्यपि वे अलगअलग क्षेत्रों में सक्रिय थे तथापि तीनों तार्किकतावादी थेअपनी बात बिना किसी लागलपेट के कहते थे और उन्हें लगातार धमकियाँ मिलती रहती थीं। उनके हत्या के तरीके में भी कई साम्य हैं। तीनों की हत्या अलसुबह हुईंहत्यारे मोटरसाइकिल सवार थेजिनमें से एक बाइक चला रहा था और दूसरे ने ताबड़तोड़ ढंग से गोलियां चलाईं और फिर दोनों भाग निकले। यह भी क्या अजीब नहीं है कि इतना समय बीत जाने के बाद भीदाभोलकर और पंसारे के हत्यारे पुलिस की पहुँच से दूर हैं।

कलबुर्गी की हत्या के बादबजरंग दल के एक कार्यकर्ता भुविथ शेट्टी ने ट्वीट किया, “पहले यूआर अनंथमूर्ति और अब एमएम कलबुर्गी। हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाओ और कुत्ते की मौत मरो। और प्रिय केएस भगवानअब तुम्हारी बारी है इस ट्वीट को बाद में वापस ले लिया गया। इसके बादहिन्दू दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े कई लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि कलबुर्गी द्वारा हिन्दू देवीदेवताओं का अपमान किये जाने से उनके प्रति हिन्दुओं के मन में रोष था और इसलिए उनकी हत्या हुई। यह एक तरह से उस असहिष्णुता को औचित्यपूर्ण ठहराने का प्रयास हैजो हमारे समाज में जड़ें जमाती जा रही है। इस मामले में सभी धर्मों के कट्टरपंथियों की सोच एकसी है। सलमान रूश्दी को धमकियाँ दीं गयीं थीं और तस्लीमा नसरीन संकुचित सोच वालों के निशाने पर थीं। बांग्लादेश में ब्लॉगरों की हत्या हुई तो पाकिस्तान में सलमान तासीर को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। तासीर का कसूर यह था कि वे ईशनिंदा की आरोपी एक ईसाई महिला का बचाव कर रहे थे।

तार्किकता का विरोधमानव इतिहास का अंग रहा है। चार्वाक ने हमारी दुनिया के प्रति ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण और विशेषकर वेदों को दैवीय बताए जाने पर प्रश्न उठाए। चार्वाक का कहना था कि वेदों को मनुष्यों ने लिखा है और वे सामाजिक ग्रंथ हैं। इस कारण चार्वाक को प्रताडि़त किया गया। समय के साथपुरोहित वर्ग द्वारा अपने विचारों को समाज पर लादने की प्रक्रिया ने संस्थागत स्वरूप ग्रहण कर लिया। गौतमबुद्धजो अनीश्वरवादी थे और मनुष्यों की समस्याओं का हल इसी दुनिया में खोजने के हामी थेकी शिक्षाओं का जबरदस्त विरोध हुआ। मध्यकालीन भक्ति संत तार्किक सोच के हामी थे और धर्म के नाम पर प्रचलित सामाजिक रीतिरिवाजोंऔरपाखंडोंकेविरोधी।महाराष्ट्रकेतुकारामजैसेकईसंतोंकोपुरोहितवर्गकेहाथोंप्रताड़नासहनीपड़ी।

दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ऐसा ही हुआ। यूरोप में कई वैज्ञानिकों को चर्च के कोप का शिकार बनना पड़ा। जब गैलिलियों ने यह कहा कि धरती गोल है तो चर्च ने उन्हें नरक में जाने का श्राप दिया। इसी तरह की प्रताड़नाकष्ट और सज़ाएं कई वैज्ञानिकों को भोगनी पड़ीं। चर्च अपनी ‘‘दैवीय सत्ता’’ का इस्तेमालसामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को रोकने और वैज्ञानिक सोच को बाधित करने के लिए करता रहा। शनैः शनैः तार्किक सोच के विरोधी कमज़ोर पड़ते गए। पुरोहित वर्ग का तर्क यह रहता है कि वे सारे ज्ञान का भंडार हैं क्योंकि हमारे ‘‘पवित्र ग्रंथों’’ में सारा ज्ञान समाहित है। इस सोच का विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों में अलगअलग ढंग से प्रकटीकरण हुआ है। पाकिस्तान में कुछ मौलानाओं ने यह दावा किया कि देश में बिजली की कमी को जिन्नात की मदद से दूर किया जा सकता है क्योंकि जिन्नात असीमित ऊर्जा के स्त्रोत हैं। उन्होंने अपने इस दावे का आधार धर्म को बताया।

भारत में स्वाधीनता संग्राम के दौरानसामाजिक परिवर्तन के हामियों ने तार्किक सोच को बढ़ावा दिया और धार्मिक ग्रंथों को तार्किकता की कसौटी पर कसना शुरू किया। परपंरावादीजो पुरातन सामाजिक समीकरणों को बनाए रखना चाहते थेने ‘‘ज्ञान की हमारी महान प्राचीन विरासत’’ का राग अलापना शुरू कर दिया। आस्था पर आधारित सोच और वैज्ञानिक पड़ताल एकदूसरे के सामने आ गए। स्वतंत्रता के बादमुख्यतः पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री होने के कारणवैज्ञानिक सोच को बढ़ावा मिला और उच्च शिक्षा व शोध के कई संस्थान स्थापित हुए। इससे देश न केवल आर्थिक दृष्टि से आगे बढ़ा वरन् उसके चरित्र का भी प्रजातांत्रिकरण हुआ। यह वह युग था जब देशवासी भारत के समग्र विकास की कल्पना को साकार करने में जुटे हुए थे और तार्किक सोच को प्रोत्साहित करनाइस प्रक्रिया का आवश्यक अंग था। सन् 1958 मेंसंसदनेराष्ट्रीयवैज्ञानिकनीतिसंकल्पपारितकिया।

सन 1980 के दशक के बाद से स्थितियां बदलने लगीं। धर्म के नाम पर राजनीति का उभार हुआ। सामाजिक उद्विग्नता को कम करने के लिए आस्था के भावनात्मक सहारे का इस्तेमाल होने लगा। कुछ राजनैतिक ताकतों ने धार्मिक पहचान और आस्था पर राजनीति करनी शुरू कर दी। जैसेजैसे सामाजिक रूढि़वाद बढ़ातार्किक सोच का विरोध भी बढ़ने लगा। लगभग इसी समय ऐसे समूह व संगठन भी उभरे जो तार्किक व वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना चाहते थे और अंधश्रद्धा के विरोधी थे। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण था केरल शास्त्र साहित्य परिषद। बाद मेंमहाराष्ट्रमेंनरेंद्रदाभोलकरनेअंधश्रद्धानिर्मूलनसमितिकागठनकिया।

अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के कार्यकर्तागांवगांव जाकर यह प्रदर्शित करने लगे कि किस प्रकार बाबाओं और तथाकथित साधुओं द्वारा दिखाए जाने वाले ‘‘चमत्कार’’ केवल हाथ की सफाई हैं। और यह भी कि ये बाबागरीब ग्रामीणों के असुरक्षा के भाव का लाभ उठाकर उनका शोषण करते हैं। अंधश्रद्धा का विरोध करने के अतिरिक्तपंसारे ने शिवाजी का एक ऐसे शासक के रूप में चित्रण करना शुरू किया जो कि सभी धर्मों का समान रूप से आदर करता था। दक्षिणपंथी इस प्रचार को पचा नहीं पा रहे थे परंतु उनके पास दाभोलकर के धारदार तर्कों का कोई जवाब भी नहीं था। कर्नाटक में यूआर अनंथमूर्ति ने मूर्तिपूजा और अंधश्रद्धा के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया। कलबुर्गी ने न केवल अनंथमूर्ति का समर्थन किया वरन उन्होंने अंधश्रद्धा को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों को प्रतिबंधित करने संबंधी विधेयक का समर्थन भी किया। उन्होंने अपने विचारों का प्रचार करने के लिए कई पुस्तकें और पेम्फलेट लिखे।

इसके कुछ समय पहलेपहली एनडीए सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री डॉमुरली मनोहर जोशी ने पौरोहित्य व ज्योतिषशास्त्र के पाठ्यक्रम विश्वविद्यालयों में लागू किए। इससे उन तत्वों को बढ़ावा मिला जो हिंदू धर्म की राजनीति करने वाली ताकतों के साथ थे और ‘‘आस्था’’ के नाम पर आमजनों को बेवकूफ बनाने में लगे हुए थे। सन् 2014 में भाजपा सरकार के दिल्ली में शासन में आने के बाद से पौराणिकता को इतिहास के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। प्राचीन भारत में हवाई जहाज हुआ करते थे और प्लास्टिक सर्जरी की जाती थीइस तरह के बेसिरपैर के दावे किए जा रहे हैं। इस सरकार के सत्ता में आने से हिंदुत्ववादी राजनीति का अतिवादी तबका बहुत उत्साहित है व काफी आक्रामक हो गया है। समाज में उदारवादी सोच के लिए स्थान कम होता जा रहा है और बहस का स्थान हिंसा ने ले लिया है। असहमत होने के अधिकार को तिलांजलि देने की कोशिश हो रही है और जो आपसे असहमत हैउसे बल प्रयोग और डराधमका कर चुप करने की प्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी हुई है। दाभोलकरपंसारे व कलबुर्गी जैसे साधु प्रवृत्ति के विद्वानों की हत्या यह बताती है कि हमारे देश में प्रतिगामी व कट्टरपंथी तत्वों का बोलबाला बढ़ रहा है। ये तत्व तार्किक सोच को समूल उखाड़ फेंकना चाहते हैं।

हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथियों द्वारा अत्यंत आक्रामकता से उन लोगों का विरोध किया जा रहा है जो तार्किक सोच के पैरोकार हैं और जातिप्रथा व मूर्तिपूजा के विरोधी हैं। ये तत्वहिंदू दक्षिणपंथी राजनीति को मज़बूती दे रहे हैं। हालिया वर्षों में राममंदिर व गौहत्या जैसे पहचान से जुड़े मुद्दों को सीढ़ी बनाकर यह राजनीति सत्ता तक पहुंची है। यह राजनीति ब्राह्मणवादी हिंदू धर्मजो कि जातिगत पदक्रम को औचित्यपूर्ण ठहराता हैपर आधारित है। दाभोलकरपंसारे व कलबुर्गी जैसे व्यक्तियों की विचारधाराहिंदुत्ववादी राजनीति की जड़ों पर प्रहार करती है। हिंदुत्ववादीधार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि हिंदू धर्म में ही अनेक विविध और परस्पर विरोधाभासी विचारधाराएं मान्यताएं सदियों से विद्यमान रही हैं। कलबुर्गी की हत्यायथास्थितिवादियोंऔरपरिवर्तनकामियोंकेबीचचलरहेसंघर्षकाप्रतीकहै।

यह सुखद है कि इन नृशंस हत्याओं का जबरदस्त विरोध हो रहा है। विविधता और तार्किकता के समर्थक समूह सोशल मीडिया में इनका विरोध कर रहे हैं और इनके पीछे की विचारधारा का पर्दाफाश कर रहे हैं। इससे यह साफ है कि अभी भी देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो तार्किकतवादी मूल्यों में आस्था रखते हैं और यही हम सबके लिए आशा की किरण है। दाभोलकर की हत्या के बाद से कई ऐसे संगठन एक मंच पर आए हैं। वे असहिष्णुपरंपरावादीआक्रामक दक्षिणपंथी राजनीति का विरोध करने के प्रति दृढ़संकल्पित हैं और सामाजिक परिवर्तन के इन पैरोकारों के अधूरे कार्य को पूरा करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

Close