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तीन कत्ल और पीटपीटकर एक शख्स की हत्या

प्रकृति के नियम, मानव समाज पर लागू नहीं किए जा सकते। परंतु कई बार इनका इस्तेमाल सामाजिक ज़लज़लों का कारण स्पष्ट करने या उनका औचित्य सिद्ध करने के लिए किया जाता है। ‘‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती है’’ (1984 के सिक्ख कत्लेआम के बाद) और ‘‘हर क्रिया की समान व विपरीत प्रतिक्रिया होती है’’ (2002 के गुजरात दंगों के दौरान), इसके दो प्रसिद्ध उदाहरण हैं। मैं पिछले करीब एक माह से इस बात से हैरान हूं कि जिन विद्वानों और लेखकों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटायें हैं उनसे यह पूछा जा रहा है कि उन्होंने यह तब क्यों नहीं किया था जब आपातकाल लगाया गया था या सिक्खविरोधी दंगे हुए थे या कश्मीर से पंडितों ने पलायन किया था या मुंबई ट्रेन धमाकों में सैंकड़ों मासूमों ने अपनी जानें गवाईं थीं।Read more

कलबुर्गी की हत्या तार्किकता का गला घोंटने का प्रयास

05 सितंबर 2015

गत 30 अगस्त 2015 को प्रोफेसर मलीशप्पा माधीवलप्पा कलबुर्गी की हत्या से देश के उन सभी लोगों को गहरा सदमा पहुंचा है जो उदारवादी समाज के हामी हैं, तार्किकता के मूल्यों का आदर करते हैं और अंधश्रद्धा के खिलाफ हैं। प्रोफेसर कलबुर्गी, जानेमाने विद्वान थे और उन्होंने 100 से भी अधिक पुस्तकें लिखीं थीं। वे 12वीं सदी के कन्नड़ संत कवि बस्वना की विचारधारा को जनता के सामने लाए। वे मानते थे कि लिंगायतजो कि बस्वना के अनुयायी हैंको धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि वे वैदिक परंपरा का हिस्सा नहीं हैं। बस्वना के छंदों में निहित शिक्षाओं, जिन्हें ‘‘वचना’’ कहा जाता है,Read more

क्या वाकई थम गई पुरस्कार वापसी मुहिम?

बिहार चुनाव के नतीजे आने का बाद सोशल मीडिया पर इन दिनों एक कविता काफी प्रसारित हो रही है। इस कविता में कहा जा रहा है कि अब कहीं से भी गोमांस, सम्मान वापसी, अरहर दाल की बढ़ती कीमतों को लेकर कोई बयान नहीं आ रहा है। यह सवाल खड़ा होता है कि क्या ऐसा सहिष्णुता की वजह से है या ऐसा बिहार का चुनाव खत्म हो जाने की वजह से है। स्पष्ट तौर पर यह आरोप लगता रहा है कि लेखकों, कलाकारों और वैज्ञानिकों द्वारा जो पुरस्कार लौटाए जा रहे थे वह बिहार चुनावों को प्रभावित करने की एक पूर्वनियोजित साजिश थी। इस संबंध में आरएसएस का मानना है कि पुरस्कार वापसी की मुहीम राजनीतिक ताकतों के हित में बहुत सलीके से संयोजित की गई थी। केंद्रीय मंत्री जनरल वी के सिंह ने तो यहां तक कहने में भी गुरेज नहीं किया कि पुरस्कार वापसी के इस मुहिम में बहुत ज्यादा पैसा सम्मिलित था। जो कुछ भी हुआ, यह उसकी पूरी तरह से एक प्रायोजित और विकृत व्याख्या है।Read more

पुरस्कार वापसी प्रजातंत्र को बचाने का प्रयास है

पिछले कुछ हफ्तों में बड़ी संख्या में लेखकों, वैज्ञानिकों और कलाकारों ने उन्हें सरकार द्वारा दिए गए पुरस्कार लौटाए हैं। यह इन लोगों का विरोध व्यक्त करने का अपना तरीका है। देश में बढ़ती असहिष्णुता और हमारे बहुवादी मूल्यों के क्षरण के विरूद्ध शिक्षाविदों, इतिहासविदों, कलाकारों और वैज्ञानिकों ने वक्तव्य जारी किए हैं। जिन लोगों ने अपने पुरस्कार लौटाए हैं, उनमें से अनेक का साहित्य, कला, फिल्म व विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण योगदान रहा है। उन्होंने केवल देश में हो रही वीभत्स घटनाओं के प्रति अपने रोष को अभिव्यक्ति दी है। बढ़ती असहिष्णुता के कारण ही दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी को अपनी जानें गंवानी पड़ीं। एक मुसलमान को सिर्फ इसलिए पीटपीटकर मार डाला गया क्योंकि ऐसा संदेह था कि उसके घर में गौमांस है। दूसरी ओर, शासक भाजपा और उससे जुड़े संगठनों के नेताओं ने पुरस्कार वापसी की कड़ी आलोचना की है।Read more

गंगाजमुनी संस्कृति पर हमलों का दौर

देश इस समय विभिन्न क्षेत्रों में पतन की राह पर अग्रसर है। धर्मनिरपेक्षता, अनेकता और भारतीय राष्ट्रीयता को राजनैतिक तौर पर कमजोर किए जाने के अलावा सांस्कृतिक बहुलता और मेलजोल की परंपरा पर भी कुठाराघात हो रहा है।दिनप्रतिदिन ये हमले और तीखे होते जा रहे हैं। असहमत बुद्धिजीवियों की हत्याओं और खानपान पर रोकटोक के जरिये पूरे माहौल को घुटन भरा बनाया जा रहा है। बहु सांस्कृतिक, बहुलतावादी विचारों में रचेबसे लेखकों पर सांप्रदायिक हमले हो रहे हैं।केरल, जहां की संस्कृति विभिन्न धर्मों की पहचान बनाए रखने और उन्हें घुलनेमिलने देने के लिए जानी जाती है, हाल ही में एक खबर की वजह से चर्चाओं में रहा।Read more

इतिहास का सांप्रदायिक संस्करण

अतीत को एक विशिष्ट ऐनक से देखनादिखाना, सांप्रदायिक ताकतों का सबसे बड़ा हथियार होता है। ‘‘दूसरे’’ समुदायों के प्रति घृणा की जड़ें, इतिहास के उन संस्करणों में हैं, जिनका कुछ हिस्सा हमारे अंग्रेज़ शासकों ने निर्मित किया था और कुछ सांप्रदायिकतावादियों ने। फिरकापरस्त ताकतें इतिहास के इस सांप्रदायिक संस्करण में से कुछ घटनाओं को चुनती हैं और फिर उन्हें इस तरह से तोड़तीमरोड़ती हैं जिससे उनका हित साधन हो सके। कई बार एक ही घटना की प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिक ताकतें, परस्पर विरोधाभासी व्याख्याएं करती हैं। सांप्रदायिक इतिहास अपने धर्म के राजाओं का महिमामंडन और दूसरे धर्म के राजाओं को खलनायक सिद्ध करने का पूरा प्रयास करता है। उदाहरणार्थ, इन दिनों, ‘‘राणा प्रताप’’ को महान बनाने का अभियान चल रहा है। कोई राजा क्यों और कैसे महान बनता है? ज़ाहिर है, इसके कारण और प्रतिमान अलगअलग होते हैं।Read more

ब्रिटिश शासन का भारत पर प्रभाव

इंग्लैंड के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में औपनिवेशिक काल विषय पर आयोजित एक परिचर्चा में दिया गया शशि थरूर का भाषण कुछ समय तक सोशल मीडिया में वायरल हो गया था। अपने भाषण में थरूर ने ब्रिटिश सरकार से यह ज़ोरदार मांग की कि वह, ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय अर्थव्यवस्था की हुई क्षति की प्रतिपूर्ति करे। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की बर्बादी के लिए अंग्रेजों को दोषी ठहराया और जलियांवाला बाग व बंगाल के अकाल का उदाहरण देते हुए कहा कि ये दोनों त्रासदियां अपने उपनिवेश के प्रति ब्रिटेन के दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती हैं। थरूर ने कहा कि अंग्रेजों ने भारत के संसाधनों का इस्तेमाल, ब्रिटेन को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने के लिए किया और वहां की औद्योगिक क्रांति के लिए धन भी भारत से ही जुटाया गया।Read more

निर्दोषों को मिले सजा: वसंतरजब का स्मारक

गुजरात हिंसा (2002) की भयावहता को शब्दों में बयां करना मुश्किल है। गोधरा में ट्रेन में लगी आग में 58 निर्दोष व्यक्तियों को जिंदा जला दिए जाने की त्रासद घटना के बहाने, बड़े पैमाने पर हिंसा भड़काई गयी, जिसमें 1,000 से अधिक लोग मारे गए। इन दंगों के बाद मुझे कई बार गुजरात जाने का अवसर मिला और अपनी इन्हीं यात्राओं के दौरान, मैंने उन दो महान नवयुवकों के बारे में जाना, जिन्होंने अहमदाबाद में जुलाई, 1946 में हुए दंगों के दौरान, लोगों को बचाने के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी थी।ये दोन वयुवक थे वसंतराव हे गिस्ते और रजब अलीलखानी।दोनों नजदीकी मित्र और कांग्रेस से वादल के कार्यकर्ता थे।मासूमों का खून बहते देख वे सड़कों पर उतर आए।वसंतराव ने मुसलमानों को बचाने का प्रयास किया और रजब अली ने हिन्दुओंको।दोनों को उन्मादी भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया।Read more

जन गण मन अधिनायक’’ नहीं है किंग जार्ज के बारे में

हमारे राष्ट्रगान पर चल रही बहस का कोई अंत दिखलाई नहीं दे रहा है। एक लंबे समय से ये कोशिशें चल रही हैं कि जन गण मन के मुकाबले वंदे मातरम को देश का बेहतर राष्ट्रगान साबित किया जाए। जन गण मन के प्रति लोगों के मन में सम्मान भाव को कम करने के लिए बारबार यह कहा जाता रहा है कि यह गीत इंग्लैंड के बादशाह जार्ज पंचम की शान में लिखा गया था। गत 7 जुलाई को राजस्थान विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए भाजपा नेता कल्याण सिंह ने इस मुद्दे को फिर से उछाला। जिस समय बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी, कल्याण सिंह उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने राष्ट्रीय एकता परिषद को यह वचन दिया था कि मस्जिद की रक्षा की जाएगी परंतु उन्होंने अपने वचन का पालन नहीं किया। कल्याण सिंह ने कहा कि हमारे राष्ट्रगान में अधिनायक शब्द जार्ज पंचम के लिए इस्तेमाल किया गया है और इसलिए राष्ट्रगान की पहली पंक्ति को ‘‘जन गण मंगल गाये’’ करदियाजानाचाहिए।Read more

धर्मनिरपेक्षता के बदले इंडिया फर्स्टपका पैंतरा

गूगल धर्मनिरपेक्षता की धारणा पर कुछ हद तक सवाल खड़े करते हुए संविधान दिवस (26 नवंबर 2015) के आयोजन ने इस बहस को एक बार फिर से खड़ा कर दिया। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उस दलील को दोहराया जिसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ परिवार अर्से से उठाता रहा है। उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्षता शब्द की विकृत परिभाषा का उपयोग समाज में तनाव उत्पन्न कर रहा है।उनके अनुसार देश में सबसे ज्यादा गलत प्रयुक्त होने वाला शब्द यही है और यह इस शब्द का गलत प्रयोग ही है जो सामाजिक तनाव पैदा कर रहा है। उन्होंने दोहराया कि इस शब्द की जड़ें पश्चिमी हैं और यह धर्म और राज्य के बीच अलगाव का प्रतीक है। भारत में चूंकि बहुसंख्यकों का धर्म अपने आप में धर्मनिरपेक्ष है इसलिए इस तरह की धारणा की यहां जरूरत नहीं है। उन्होंने आरएसएस विचारकों की पुरानी दलीलों को दोहराया कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में इस धर्मनिरपेक्ष शब्द की कोई आवश्यक्ता नहीं है।Read more

राष्ट्रीय विभूतियों पर कब्जा जमाने की संघी कवायद

6 जून 2015

पिछले कुछ वर्षों से, राजनैतिक और सामाजिक स्तरों पर कुछ राष्ट्रीय विभूतियों का महिमामंडन करने और कुछ का कद घटाने के सघन प्रयास हुए हैं। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के पिछले शासनकाल (1998-2004) मेंसंसदपरिसरमेंसावरकरकेतैलचित्रकाअनावरणकियागयाथा।कुछ विभूतियों की भूमिका को बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत करने और कुछ की छवि बिगाड़ने के खेल में आरएसएस पुराना उस्ताद है, यद्यपि अन्य राजनैतिक समूह भी ऐसा करते रहे हैं। संघ की मशीनरी, कुछ नेताओं का महिमामंडन, कुछ को नजरअंदाज करने और कुछ को बदनाम करने का काम दशकों से करती आई है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से संघ परिवार के कई सदस्य महात्मा गाँधी के हत्यारे गोडसे की खुलकर तारीफ कर रहे हैं। एक भाजपा सांसद ने गोडसे को देशभक्त बताया तो दूसरे ने फरमाया कि गोडसे ने गलत व्यक्ति को निशाना बनाया था। उसे नेहरु की हत्या करनी चाहिए थी। कई लोगों ने माँग की है कि अलगअलग स्थानों पर गोडसे की मूर्तियाँ स्थापित करने के लिए जमीन आवंटित की जाए।Read more

मोदी सरकार का पहला साल नफरत फैलाने के नाम

29 मई 2015

नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आते ही मानों आरएसएस के सभी संगीसाथियों को धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने का लाईसेंस मिल गया है। जहर उगलने के इस अभियान का उद्देश्य सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बनाये रखना है। एमआईएम के अकबरुद्दीन ओवेसी का घृणा फैलाने वाला भाषण निश्चित तौर पर घिनौना था और इस साल जनवरी में उनकी गिरफ्तारी के बाद अगर उन्हें 40 दिन जेल में बिताने पड़े तो यह बिलकुल ठीक हुआ। उनपर मुकदमा चलना चाहिए और उन्हें कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए। परन्तु प्रवीण तोगडि़या, सुब्रमण्यम स्वामी, गिरिराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति, साध्वी प्राची, साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, संजय राउत आदि का क्या, जिन्होंने सार्वजनिक मंचों से निहायत बेहूदा, कुत्सित और गैरजिम्मेदाराना टिप्पणियां की हैं। क्या ओवेसी की तरह उन्हें भी गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए था?Read more

मोदी सरकार का एक वर्ष

विघटनकारी एजेण्डा

इस साल मई में मोदी सरकार अपना एक साल पूरा कर लेगी। गुजरा साल, मुख्यतः, समाज में अलगाव और विघटन पैदा करने वाली राजनीति के नाम रहा। जहां मोदी का चुनाव अभियान विकास पर केंद्रित था वहीं उन्होंने सांप्रदायिक मुद्दे उठाने में भी कोई कोरकसर बाकी नहीं रखी। बांग्लाभाषी मुसलमानों को बंगलादेशी बताया गया और ‘‘पिंक रेवोल्यूशन’’ की चर्चा हुई। उद्देश्य था, अपरोक्ष रूप से मुसलमानों का दानवीकरण।मोदी सरकार की नीतियों में हिंदू राष्ट्रवाद के भाजपाई एजेण्डे का खुलकर प्रकटीकरण हुआ। गणतंत्र दिवस 2015 के अवसर पर सरकार द्वारा जारी विज्ञापन में संविधान की उद्देशिका से ‘‘धर्मनिरपेक्ष’’ ‘‘समाजवादी’’ शब्द गायब थे। केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज ने हिंदू धर्मग्रंथ ‘‘भगवत गीता’’ को राष्ट्रीय पुस्तक का दर्जा देने की मांग की। एक अन्य केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने सभी गैरहिंदुओं को हरामजादा बताया तो अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नज़मा हैपतुल्लाह ने फरमाया कि मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं हैं क्योंकि देश में उनकी खासी आबादी है।Read more

रक्षाबंधनपितृसत्तात्मक मानसिकता को बढ़ावा

गत 21 जून 2015 को धूमधाम से योग दिवस मनाने के बाद, मोदीसरकारबड़ेपैमानेपररक्षाबंधनमनानेकीतैयारीकररहीहै।इसयोजनाकोभाजपाकेपितृसंगठनआरएसएसकाआशीर्वादप्राप्तहै।बिनाकिसीसंकोचयाहिचककेएकहिंदूधार्मिकत्योहारकोराष्ट्रीयत्योहारकादर्जादियाजारहाहै।यहइससरकारकेसंकीर्णराष्ट्रवादकेगुप्तएजेंडेकीओरसंकेतकरताहै।रक्षाबंधन का अर्थ है ‘‘रक्षा करने के वचन में बंधना’’ और यह देश के लोकप्रिय त्योहारों में से एक है, जिसे हिंदू, जैन और कुछ सिक्ख मनाते हैं। कई कहानियों में इस त्योहार का इस्तेमाल ऐसे लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किया जाना बताया गया है, जो एक अर्थ में धार्मिक पहचान से ऊपर व परे हैं। कहा जाता है कि सन् 1535 में चित्तौढ़ की रानी करनावती ने बादशाह हुमांयू को तब राखी भेजी, जब उनकी रियासत पर गुजरात के सुल्तान बाहदुरशाह ने हमला बोल दिया।Read more